Wednesday, January 27, 2021

भोजपुरी के शेक्सपियर-भिखारी ठाकुर

भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर की टोली में रंगमंच पर नाट्य कला का जादू बिखेरने और लौंडा नाच की परंपरा शुरु करने वाले शख्स रामचंद्र मांझी को इस बार पद्मश्री सम्मान मिला.. जिसके बाद एक बार फिर भिखारी ठाकुर की नाटक मंडली चर्चा में हैं.. 



भिखारी ठाकुर की मंडली का आखिरी लौंडा

भिखारी ठाकुर की नाच मंडली के आखिरी लौंडा रामचंद्र माझी.. जब मंच पर भिखारी ठाकुर के नाटक विदेशिया का मंचन करते हैं... तो लोगों को एहसास नहीं होता कि... इस उम्र में भी ऐसी कला का प्रदर्शन किया जा सकता है... लौंडा नाच की परंपरा की शुरुआत रामचंद्र मांझी ने हीं की थी.... विदेशिया नाच बिहार में उस वक्त शुरू हुई थी.. जब बिहार भुखमरी और बेरोजगारी से जूझ रहा था....लोग रोजगार की तलाश में बाहर जाते थे... और पत्नियां घर पर रहती थीं.... महिलाओं के विरह की कहानी को विदेशिया के रूप में भिखारी ठाकुर ने मंच पर लाया था.... नाटक इतना मशहूर हुआ और देश-विदेश में इतनी ख्याति मिली... जो देशव काल की सीमा को लांघ गई.. लेकिन धीरे-धीरे इस नाटक के कलाकार लुप्त होते गए... और अब तो एकमात्र कलाकार रामचंद्र मांझी बच गए... जिन्हें अब सरकार पद्मश्री सम्मान देने जा रही है....रामचंद्र मांझी के बाद इस कला की सेवा करने वाला कोई कलाकार नजर नहीं आ रहा.... खुद रामचंद्र माझी मानते हैं कि... उस वक्त भुखमरी और बेरोजगारी के कारण लोग अपने लड़कों को इस मंडली में भेजते थे... लेकिन अब विकास हो चुका है और शिक्षा का स्तर भी काफी ऊंचा है... लिहाजा लौंडा नाच की तरफ कोई नहीं आता..


सम्मान को लेकर खुशी 

छपरा के नगरा प्रखंड के तुजारपुर के रहने वाले... रामचंद्र माझी का परिवार मिलने वाले सम्मान को लेकर काफी खुश है.... लेकिन इनके परिवार का कोई भी सदस्य इस कला से नहीं जुड़ा है... रामचंद्र माझी इस कला को बचाने के लिए ताउम्र संघर्ष करते रहे... और अपने परिवार को इससे अलग रखा... क्योंकि वे जानते थे कि इस कला का कोई भविष्य नहीं है... लोग इस कला को कला की तरह नहीं... बल्कि उपेक्षा की नजरों से देखते थे... क्योंकि हमारे समाज में पुरुषों का लौंडा बनना कहीं से जायज नहीं माना जाता था..

विरासत का आखिरी लौंडा 

94 साल के रामचंद्र माझी अभी भी मंच से जुड़े हुए हैं.... और कई जगहों पर इनके नाटकों का मंचन होता है... लेकिन आने वाले समय में भिखारी ठाकुर का लौंडा नाच और विदेशीया कहीं अतीत के पन्नों में गुम ना हो जाए... इसके लिए भी सोचना होगा... क्योंकि रामचंद्र मांझी इस विरासत के आखिरी लौंडा साबित होंगे


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